नमस्कार ! राष्ट्र की बात के साथ मैं हूँ विश्राम सिंह यादव। आज राष्ट्र की बात में मैं लोकसभा में 11 अगस्त, 2023 को पारित तीन कानूनी विधेयकों पर चर्चा करेंगे। ये तीन विधेयक: भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम- 2023 हैं। ये विधेयक क्रमश: भारतीय दंड संहिता (IPC)-1860, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) – 1898 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (iec) – 1872 की जगह लेंगे। इन कानूनों में कुल 313 बदलाव किए गए।
कानूनों में सुधार का मतलब यह नहीं है कि मौजूदा प्रावधानों को ही दोबारा व्यवस्थित कर जाये। बदलाव करते हुए यह व्यापक सोच हमारे सामने होली चाहिए कि मौजूदा समय और परिस्थिति में कैसे हों। तीनों कानूनों की गंभीरता से जांच करेंगे, तो पाएंगे कि. उनका एक ही काम है-‘चीजों के नाम बदलकर नागरिकों को भ्रमित और गुमराह करना। इससे फायदे कम नुकसान ज्यादा होते हैं ...।
आईपीसी, 1860, आईईसी, 1872 और सीआरपीसी, 1973 हमारे यहां आपराधिक न्याय प्रणाली के तीन स्तंभ हैं। IPC के प्रणेता थॉमस लैबिंग्टन मैकाले थे, जिन्होंने प्रथम विधि आयोग की अध्यक्षता की थी। आईईसी के लेखक सर जेम्स फिट जेम्स स्टीफन थे।
वर्ष 1973 में नया कानून पारित कर 1898 की CrPC को निरस्त कर दिया गया था। देश की अदालतों में रोज इन तीनों कानूनों का प्रयोग होता है। हजारों जज और 150000 से अधिक वकील ( जिनमें से ज्यादातर फौजदारी मामलों से जुड़े होते हैं) लगभग रोज ही इन तीनों कानूनों से गुजरते हैं। हर जज या वकील यह जानता है कि आईपीसी की धारा- 302 हत्या के मामले में लगती है। वे जानते हैं कि IPC की धारा- 25 के तहत किसी पुलिस अधिकारी के सामने दिए गए बयान से अदालत में आरोपी के खिलाफ अपराध तय नहीं होते। वे यह भी जानते हैं कि सीआरपीसी की धारा- 437, 438 और 439 में अग्रिम जमानत और जमानत देने के प्रावधान है। इन तीनों कानूनों में ऐसे अनेक प्रावधान हैं, जिनके बारे में जजों और वकीलों को गहराई से जानकारी है।
गंवाया सुधार का मौका:
कानूनों में सुधार करना अच्छा विचार है, लेकिन सुधार का मतलब यह नहीं है कि मौजूदा प्रावधानों को ही दोबारा व्यवस्थित कर दिया जाए, या उनको फिर से क्रम दिया जाए। बदलाव करते हुए यह व्यापक सोच हमारे सामने होनी चाहिए कि वर्तमान समय और परिस्थिति में आपराधिक कानून कैसा होना चाहिए। निश्चित रूप से कानून को बदले हुए जीवन मूल्यों, आदशों, आचार- विचार और आकांक्षाओं के अनुरूप होना चाहिए। आधुनिक अपराध विज्ञान, आपराधिक न्याय शास्त्र तथा सजा व जेलों से जुड़े आधुनिक अध्ययनों के जरूरी हिस्से नये कानून में दिखने ही चाहिए।
पुनर्व्यवस्थित प्रावधानः
लेकिन इन तीनों विधेयकों में हम क्या पाते हैं? कानून के क्षेत्र के अनेक विद्वानों ने इन तीनों विधेयकों की गंभीरता से जांच की है। हम यह पाते हैं कि IPC के 90-95% प्रावधान उठाकर नए मसौदे में जोड़़ दिए हैं|
IPC के 26 में से 18 अध्याय (तीन अध्यायों में सिर्फ एक-एक धाराएं ही थी) नए विधेयक में ज्यों के त्यों रख दिए गए हैं। स्थाई समिति की रिपोर्ट में भी यह स्वीकारा गया है कि विधेयक में आईपीसी की 511 धाराओं में से १५ को हटा दिया गया है और २२ धाराएं जोड़ी गई हैं- वाकी को जस का तस रखा गया है, हालांकि उन्हें दोबारा व्यवस्थित किया गया है और उनके क्रम बदले गए है। भारतीय न्याय संहिता, २०२३ में 356 धाराएं होगी (IPC) 511 थीं), 175 धाराओं में बदलाव किया गया है। इन बदलावों को आईपीसी में संशोधन करके बहुत आसानी से लागू किया जा सकता था। साक्षय अधिनियम और सीआरपीसी में भी यही कहानी दोहराई गई है। साध्य अधिनियम की सभी 170 धाराओं को नए विधेयक में जोड़ा गया है। Iec में 167 धाराएं श्री, कुल २३ धाराओं में बदलाव किया गया है, 1 धारा जोड़ी गई, 5 धाराएं हटाई गई। एसे ही सीआरपीसी का 95% हिस्सा कट- कॉपी- पेस्ट है। जाहिर है, यह पूरी कवायद श्रम, समय और संसाधनों की बर्बादी थी। यही नहीं, विधेयक के पारित होने पर कई अनपेक्षित परिणाम होंगे। यह कोई छोटी परेशानी नहीं है कि हजारों जजों, वकीलों, पुलिस अधिकारियों, कानून के छात्रों-यहां तक कि आम नागरिकों को भी भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। उन्हें कानूनों की फिर से जानकारी हासिल करनी पड़ेगी। जहां तक विधेयकों की विषय वस्तुओं का सवाल है, तो इनमें कुछ अच्छी चीजें हैं, जिनके बारे में सरकार संसद में बताएगी, लेकिन मैं उन विधेयकों के उन बिंदुओं पर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं, जिनसे सवाल उठते हैं। उनमें से महत्वपूर्ण ये हैं:
प्रतिगामी प्रावधान:
मृत्युदंड की सजा को खत्म किए जाने की सार्वभौमिक भांग के बावजूद इसे बनाए रखे गया है। बीते 6 साल में शीर्ष अदालत ने सिर्फ सात मामलों में मौत की सजा सुनाई है। किसी भी व्यक्ति को सुधार का मौका दिए जाने के नाम पर बगैर जमानत आजीवन कारावास में रखना कहीं ज्यादा सख्त है। व्यभिचार को, जो पति और पत्नी के बीच का मामला माना जाता है, फिर से अपराध की श्रेणी में लाया गया है। इसके आधार पर पति या पत्नी तलाक के लिए मुकदमा कर सकते हैं। सरकार को उनकी जिंदगी में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। इससे भी बुरा यह है कि IPC की धारा-497, जिसे शीर्ष कोर्ट ने रद्द कर दिया था, उसे लिंग के प्रति तटस्थता रखते हुए वापस लाया गया है। बगैर कारण बताए, मृत्युदंड या आजीवन कारावास की सजाओं को कम करने या बदलने की कार्यपालिका की शक्ति संविधान के अनुच्छेद-14 का उल्लंघन है। एकांत कारावास एक क्रूर और असामान्य सजा है। कुछ मामलों मैं अदालत की कार्यवाहियों की मीडिया रिपोर्टिंग को विधायिका द्वारा रोका जाना असंवैधानिक है।
इसके अलावा, सहायक सत्र न्यायाधीश के पद को खत्म करना भी सही नहीं है, क्योंकि, इससे सत्र न्यायाधीश पर बोझ लड़ेगा। इस व्यवस्था में पहली अपील उच्च न्यायालय में होगी, जिससे उच्च न्यायालयों पर भी बोझ बढ़ेगा। हथकड़ी लगाने की अनुमति सिर्फ तभी देनी चाहिए, जब हिरासत में रखा गया व्यक्ति हिंसक हो या उसके भागने या पलायन की आशंका हो जिस मजिस्ट्रेट के सामने हिरासत में लिए गए चकित को रिमांड के लिए लाया जाता है, उसे व्यक्ति की गिरफ्तारी की जरूरत और वैधता को लेकर संतुष्ट होना आवश्यक है। नई अपराध संहिता का खंड 187(२) पुलिस अधिकारियों और न्यायाधीशों के बीच गलत धारणा पैदा करता है कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को पुलिस या न्यायिक हिरासत में भेजा जाना चाहिए। मुझे न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर की वह चेतावनी याद आती है कि मजिस्ट्रेट “किसी हिरासत की जरूरत नहीं” के तीसरे विकल्प की अनदेखी करते हैं।
जांच अधिकारी को श्रव्य दृश्य माध्यमों से गवाही देने की अनुमति देता है, खुले सार्वजनिक न्यायालय में निष्पक्ष कार्यवाही के सिद्धांत का स्पष्ट उल्लंघन है। नया विधेयक यह स्पष्ट करने में विफल है कि "जमानत एक नियम है और जेल अपवाद है।" नतीजतन, खंड 482 प्रतिगामी है।
सरकार की मंशा तो मैकाले और जेम्स स्टीफन की तरह कुछ ऐतिहासिक बदलाव लाने की थी, लेकिन ज्यादातर मौजूदा कानूनों को कॉपी, कल और पेस्ट करने से कथित बदलाव महज दो औपनिवेशिक हस्तियों को श्रद्धांजलि बन कर रह गए हैं।
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विश्राम सिंह यादव 24 नवंबर, 2023
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