भूमिका
हाल ही में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसने पति-पत्नी के रिश्तों को लेकर कानूनी परिभाषाओं को स्पष्ट किया। यह फैसला विशेष रूप से वैवाहिक बलात्कार और अप्राकृतिक कृत्यों से संबंधित था। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शादीशुदा जोड़े के बीच शारीरिक संबंधों को आईपीसी की धारा 377 के तहत अपराध नहीं माना जा सकता। यह निर्णय भारतीय कानून और समाज के दृष्टिकोण से एक ऐतिहासिक और चर्चित मुद्दा बन गया है।
क्या है मामला?
यह मामला मध्य प्रदेश के धार जिले के कांग्रेस विधायक उमंग सिंघार से जुड़ा हुआ है। उनकी पत्नी ने 2022 में नोंगांव थाने में उनके खिलाफ यौन हिंसा, धमकी और अप्राकृतिक कृत्य करने की एफआईआर दर्ज कराई थी। कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान यह पाया गया कि एफआईआर में कोई तिथि और स्थान का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया था। इसके अलावा, आरोपों में घरेलू हिंसा की बजाय यौन हमले का मामला दर्ज कराया गया था, जबकि वास्तविक रूप से इसे घरेलू हिंसा की श्रेणी में आना चाहिए था।
हाई कोर्ट का फैसला
हाई कोर्ट ने इस मामले में एक बड़ा निर्णय लेते हुए कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 में 2013 में किए गए संशोधन के बाद पति-पत्नी के बीच बलात्कार का मामला नहीं बनता है। इसके अलावा, आईपीसी की धारा 377 को लेकर भी स्पष्ट किया गया कि पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंधों को अप्राकृतिक अपराध नहीं माना जा सकता।
आईपीसी की धारा 375 और 377 क्या कहती हैं?
1. धारा 375 (बलात्कार की परिभाषा)
यह धारा स्पष्ट करती है कि किसी महिला की इच्छा के विरुद्ध जबरदस्ती किए गए यौन संबंध बलात्कार की श्रेणी में आते हैं।
2013 के संशोधन के अनुसार, पति द्वारा पत्नी के साथ बनाए गए संबंधों को बलात्कार की परिभाषा से बाहर रखा गया था।
2. धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध)
यह धारा विशेष रूप से "अप्राकृतिक यौन संबंधों" को अपराध मानती है, जैसे कि जबरन समलैंगिक संबंध या पशुओं के साथ संबंध।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति-पत्नी के रिश्तों में इसे लागू नहीं किया जा सकता।
न्यायालय का तर्क और महत्वपूर्ण बिंदु
हाई कोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी के संबंधों में स्वाभाविक रूप से सहमति शामिल होती है और इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
यदि पति द्वारा पत्नी के साथ कोई जबरदस्ती होती है, तो उसे घरेलू हिंसा के तहत देखा जाना चाहिए, न कि धारा 377 के तहत।
कोर्ट ने यह भी कहा कि वैवाहिक संबंधों में गोपनीयता और निजता के अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिए।
समाज पर प्रभाव
इस फैसले का समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। यह उन मामलों को रोक सकता है, जहां झूठे आरोप लगाकर किसी व्यक्ति को कानूनी दांव-पेंच में फंसाने की कोशिश की जाती है। हालांकि, इस फैसले की आलोचना भी हो सकती है क्योंकि यह उन महिलाओं के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है, जो वैवाहिक दुष्कर्म (marital rape) के खिलाफ न्याय पाना चाहती हैं।
विवाह और कानून: क्या बदलाव की जरूरत है?
भारत में विवाह को एक पवित्र बंधन माना जाता है, जहां पति-पत्नी के बीच आपसी सहमति और विश्वास ही संबंधों की नींव होती है। लेकिन जब इसी संबंध में हिंसा या जबरदस्ती होती है, तो इसे कैसे परिभाषित किया जाए?
कुछ लोग मानते हैं कि भारत में वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित किया जाना चाहिए, ताकि महिलाओं को भी समान अधिकार मिल सकें।
दूसरी ओर, कुछ लोगों का मानना है कि इससे झूठे आरोपों की संख्या बढ़ सकती है और वैवाहिक संबंधों में हस्तक्षेप हो सकता है।
अन्य देशों की स्थिति
अमेरिका और ब्रिटेन: इन देशों में वैवाहिक बलात्कार को अपराध माना जाता है।
भारत: यहां अभी तक वैवाहिक बलात्कार को कानूनी रूप से मान्यता नहीं दी गई है, लेकिन इस पर बहस जारी है।
मध्य पूर्व और एशिया के कई देश: यहां परंपरागत रूप से पति-पत्नी के संबंधों को निजी मामला माना जाता है।
निष्कर्ष
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का यह फैसला कानूनी दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण है। इसने पति-पत्नी के रिश्तों को लेकर समाज और कानून के बीच संतुलन स्थापित करने की कोशिश की है। हालांकि, इस परिदृश्य में आगे भी बहस होती रहेगी कि क्या विवाह के अंदर भी बलात्कार की परिभाषा लागू होनी चाहिए या नहीं।
इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि पति-पत्नी के रिश्तों में कानून का हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए, लेकिन अगर जबरदस्ती और हिंसा होती है, तो उसे घरेलू हिंसा के तहत देखा जाना चाहिए। भविष्य में, इस विषय पर और स्पष्टता की आवश्यकता होगी ताकि समाज में महिलाओं की सुरक्षा और पुरुषों के अधिकारों के बीच संतुलन बना रहे।
लेखक:
विश्राम सिंह यादव
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